शीर्षक- "गांधी जी के सत्य अहिंसा का सिद्धान्त वर्तमान संदर्भ में कितना प्रासंगिक है?" (विपक्ष में वक्तव्य)
“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥”
यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है। जिसका मतलब है कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होगी, तब-तब मैं इस भू-धरा पर जन्म लूंगा और आततायियों का संहार करूंगा। श्रीकृष्ण के भी कहने का आशय यही है कि यदि समाज संकट में है, तो हिंसा करना जायज है। हालांकि हिंसा करना या असत्य बोलना नैतिकता की श्रेणी में नहीं आता है, लेकिन मात्र सत्य व अहिंसा से कलियुग के इस प्रथम चरण में जीना असम्भव सा प्रतीत होता है।
कश्मीर में अलगाववादियों से लड रहे भारत के जवान हों या सरहद पर शहीद वीर सपूत-सभी अहिंसा चाहते हैं, लेकिन जब उरी में सैन्य छावनी में आतंकी हमला होता है, तो वह अहिंसा का रास्ता छोड आतंकी को मारकर हिंसा करता है, जिसका लक्ष्य शांति स्थापित करना होता है। अतः आज हिंसा भी अनिवार्य सी प्रतीत होती है।
मान्यवर! यदि अहिंसा और सत्य से दुनिया चलती, तो भगवान राम को रावण का वध नहीं करना पडता, और न ही महाभारत होती। पांडवों ने सत्य को चुना, परिणाम सबके सामने है- द्रौपदी का चीरहरण भरी सभा में हुआ था। उस समय तो भगवान ने इज्जत बचा ली थी, लेकिन जब आज एक युवती या बच्ची खेत में जाती है और उसके साथ दुष्कर्म करने की कोशिश की जाती है, तो उसे बचाने कोई कृष्ण नहीं आने वाला। यदि पास ही कोई हथियार अथवा कोई अन्य चीज उसे मिले, तो आत्मसम्मान में उसे हिंसा करने में तनिक भी देर नहीं करनी चाहिए। इसलिए गांधीजी की अहिंसा मात्र किसी कार्य की नहीं।
मान्यवर! आप किस सत्य की बात कर रहे हैं? इस असत्य की जीत के कारण बेगुनाह जेल में पिसता है और गुनहगार खुलेआम मजे लेता है, लेकिन अदालत को क्या चाहिए? तो जबाब आता है- सबूत। आप कितने ही उदाहरण आज देख सकते हैं।
फिर भी मैं आपको सटीक उदाहरण देता हूं-
जनाब! हमारे भारत की राजधानी दिल्ली के मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल जी ने अपने मुख्य सचिव के साथ मारपीट की, जो स्पष्ट हो भी चुकी है। लेकिन बेचारा सचिव आज भी परेशान है और केजरीवाल जी आनन्द ले रहे हैं।
आपको पता होना चाहिए कि सत्य बोलने वाला आदमी कष्टमय जीवन ही जीता है। असत्य को जितनी शीघ्रता से बोलकर अपना कार्य किया जा सकता है, सत्य से नहीं हो सकता। क्योंकि समाज को असत्य की आदत हो चुकी है। भ्रष्टाचार के द्वारा कैसे अमीर बना जा सकता है और कैसे ही रिश्वत ले-देकर अपना उल्लू सीधा किया जाता है, ये सब आप लोग जानते ही हैं। आप ही बताइए! कि आप में से क्या कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसने असत्य बोलकर अपना उल्लू सीधा न किया हो? उत्तर न में ही मिलेगा। तो बस यहीं निष्कर्ष निकल जाता है कि आज के जमाने में सत्य से काम नहीं चलता है।
अंत में, मैं भारतीय सनातन संस्कृति के उद्घोष के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूं-
“धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो, मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
अर्थात् जो पुरुष धर्म का नाश करता है, धर्म उसी का नाश कर देता है। इसीलिए धर्म का रक्षण करना चाहिए, क्योंकि तभी धर्म तुम्हारा रक्षण करेगा। यहाँ धर्म से आशय मानवता से है और यदि मानवता पर कोई संकट आता है, तो हिंसा व असत्य स्वीकार करनी चाहिए व धर्म का रक्षण कर एक सुखी धार्मिक समाज की स्थापना करनी चाहिए।
वह समय अलग था, जब गांधी जी के सत्य-अहिंसा से काम चला था। वैसे भी सिद्धान्त देना अलग चीज है और प्रैक्टिकल ज्ञान अलग चीज है। आज गांधी जी प्रासंगिक अवश्य हैं, लेकिन मात्र गांधी जी से काम नहीं चलने वाला यह वर्तमान का कटु सत्य है। आज यदि मैं इस भाषण में सत्य बोला, तो आप लोग ही मुझे बेबकूफ कहेंगे, इसलिए मैं भी आज असत्य ही बोल रहा हूं।
“ वन्दे मातरम्!! भारत माता की जय!! ”
(इस ब्लॉग को एक भाषण की तरह लिखने की कोशिश की गई है, जिसमें यह पक्ष रखा गया है कि क्या आज के समय में हिंसा आवश्यक सी प्रतीत होती है?क्या अहिंसा से कार्य सम्पन्न हो सकता है?क्या आवश्यकता होने पर अहिंसा का त्याग करना चाहिए?)"
By- Yogendra Shaurya Bhardwaj

“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥”
यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है। जिसका मतलब है कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होगी, तब-तब मैं इस भू-धरा पर जन्म लूंगा और आततायियों का संहार करूंगा। श्रीकृष्ण के भी कहने का आशय यही है कि यदि समाज संकट में है, तो हिंसा करना जायज है। हालांकि हिंसा करना या असत्य बोलना नैतिकता की श्रेणी में नहीं आता है, लेकिन मात्र सत्य व अहिंसा से कलियुग के इस प्रथम चरण में जीना असम्भव सा प्रतीत होता है।
कश्मीर में अलगाववादियों से लड रहे भारत के जवान हों या सरहद पर शहीद वीर सपूत-सभी अहिंसा चाहते हैं, लेकिन जब उरी में सैन्य छावनी में आतंकी हमला होता है, तो वह अहिंसा का रास्ता छोड आतंकी को मारकर हिंसा करता है, जिसका लक्ष्य शांति स्थापित करना होता है। अतः आज हिंसा भी अनिवार्य सी प्रतीत होती है।
मान्यवर! यदि अहिंसा और सत्य से दुनिया चलती, तो भगवान राम को रावण का वध नहीं करना पडता, और न ही महाभारत होती। पांडवों ने सत्य को चुना, परिणाम सबके सामने है- द्रौपदी का चीरहरण भरी सभा में हुआ था। उस समय तो भगवान ने इज्जत बचा ली थी, लेकिन जब आज एक युवती या बच्ची खेत में जाती है और उसके साथ दुष्कर्म करने की कोशिश की जाती है, तो उसे बचाने कोई कृष्ण नहीं आने वाला। यदि पास ही कोई हथियार अथवा कोई अन्य चीज उसे मिले, तो आत्मसम्मान में उसे हिंसा करने में तनिक भी देर नहीं करनी चाहिए। इसलिए गांधीजी की अहिंसा मात्र किसी कार्य की नहीं।
मान्यवर! आप किस सत्य की बात कर रहे हैं? इस असत्य की जीत के कारण बेगुनाह जेल में पिसता है और गुनहगार खुलेआम मजे लेता है, लेकिन अदालत को क्या चाहिए? तो जबाब आता है- सबूत। आप कितने ही उदाहरण आज देख सकते हैं।
फिर भी मैं आपको सटीक उदाहरण देता हूं-
जनाब! हमारे भारत की राजधानी दिल्ली के मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल जी ने अपने मुख्य सचिव के साथ मारपीट की, जो स्पष्ट हो भी चुकी है। लेकिन बेचारा सचिव आज भी परेशान है और केजरीवाल जी आनन्द ले रहे हैं।
आपको पता होना चाहिए कि सत्य बोलने वाला आदमी कष्टमय जीवन ही जीता है। असत्य को जितनी शीघ्रता से बोलकर अपना कार्य किया जा सकता है, सत्य से नहीं हो सकता। क्योंकि समाज को असत्य की आदत हो चुकी है। भ्रष्टाचार के द्वारा कैसे अमीर बना जा सकता है और कैसे ही रिश्वत ले-देकर अपना उल्लू सीधा किया जाता है, ये सब आप लोग जानते ही हैं। आप ही बताइए! कि आप में से क्या कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसने असत्य बोलकर अपना उल्लू सीधा न किया हो? उत्तर न में ही मिलेगा। तो बस यहीं निष्कर्ष निकल जाता है कि आज के जमाने में सत्य से काम नहीं चलता है।
अंत में, मैं भारतीय सनातन संस्कृति के उद्घोष के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूं-
“धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो, मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
अर्थात् जो पुरुष धर्म का नाश करता है, धर्म उसी का नाश कर देता है। इसीलिए धर्म का रक्षण करना चाहिए, क्योंकि तभी धर्म तुम्हारा रक्षण करेगा। यहाँ धर्म से आशय मानवता से है और यदि मानवता पर कोई संकट आता है, तो हिंसा व असत्य स्वीकार करनी चाहिए व धर्म का रक्षण कर एक सुखी धार्मिक समाज की स्थापना करनी चाहिए।
वह समय अलग था, जब गांधी जी के सत्य-अहिंसा से काम चला था। वैसे भी सिद्धान्त देना अलग चीज है और प्रैक्टिकल ज्ञान अलग चीज है। आज गांधी जी प्रासंगिक अवश्य हैं, लेकिन मात्र गांधी जी से काम नहीं चलने वाला यह वर्तमान का कटु सत्य है। आज यदि मैं इस भाषण में सत्य बोला, तो आप लोग ही मुझे बेबकूफ कहेंगे, इसलिए मैं भी आज असत्य ही बोल रहा हूं।
“ वन्दे मातरम्!! भारत माता की जय!! ”
(इस ब्लॉग को एक भाषण की तरह लिखने की कोशिश की गई है, जिसमें यह पक्ष रखा गया है कि क्या आज के समय में हिंसा आवश्यक सी प्रतीत होती है?क्या अहिंसा से कार्य सम्पन्न हो सकता है?क्या आवश्यकता होने पर अहिंसा का त्याग करना चाहिए?)"
By- Yogendra Shaurya Bhardwaj



5 comments:
Ahinsa parmo dharma.... Dharm hinsa tathaiv cha.... Bahut sahi Bhaiya.. Samprati samah jaha aaj kahi bhi atankbadi hamle or mahilao k sath durvyabhaar ho raha to aaj aabashyakta hai ki pratyek manushya ko apni raksha hetu hinsa ka marg bhi chalna chahiye....kyoki mera manna hai aaj agar ek gaal par thappad khakar doosra gaal aage kiya to samne Bala us gal par bhi maar dega.. Isliye pahle thappad ki koshish par hi mukka maar dena chahiye..
कटु सत्य है, परन्तु केवल धर्म की रक्षा करने के लिए ही यह उचित है, अन्यथा प्रभु में विश्वास रखो, समय बहुत बलवान होता है और सबसे अच्छा उत्तर भी। जय श्री राम।।
पहली बात आत्मरक्षा के लिए किया गया प्रतिकार हिंसा नहीं कहलाता, दूसरी बात अपने धर्म के बचाव या अपने आत्मसम्मान को सुरक्षित रखने के लिए किया गया प्रतिकार भी हिंसा की श्रेणी में नहीं आना चाहिए । हिंसा वह है जब हम किसी निरीह प्राणी को सताएं या किसी निहत्थे व्यक्ति पर अपना बाहुबल का या अपने किसी और बल का प्रयोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए करें वास्तव में वह हिंसा कहलाती है । रामायण तथा महाभारत में हिंसा नहीं थी, अपने अपने बचाव के लिए किया गया प्रयत्न था । हिंदू हिंसक नहीं है यह बात साबित हो चुकी है, सब जानते हैं लेकिन आज के समय में हिंदू को हिंसक बताया जा रहा है । हिंदू आदि काल से ही अहिंसक रहा है उसके लिए 'अहिंसा परमधर्म' ही रहा है । यदि हिंदू हिंसक होता तो 30 साल पहले कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से जब निकाला जा रहा था वह तब भी हिंसा का रास्ता अपना सकता था लेकिन नहीं ।आज तक मुझे ऐसा व्यक्ति नहीं मिला कश्मीरी पंडितों में से जिसने हिंसा का रास्ता अपनाया हो ।लेकिन आज का समय ऐसा आता जा रहा है कि केवल अहिंसा से ही -मेरा कहने का तात्पर्य अपने बचाव के लिए हिंसा जरूरी है (मैं उसको हिंसा का नाम नहीं दूंगा) मैं सिर्फ उसको इतना कहूंगा अपने बचाव के लिए आपको जो जरूरी हो वह करना चाहिए ।अपने धर्म की स्थापना के लिए, उसके संरक्षण, संवर्धन के लिए जो जरूरी हो वह करना चाहिए फिर चाहे वह आपको हिंसा ही क्यों न लगे ।धन्यवाद !योगेन्द्र भाई बहुत अच्छा लेख है ।
मैं आपका आभार व्यक्त करता हूँ।
यह सहसा उत्पन्न विचार थे।
मेरी आकांक्षा है कि भारतीय संस्कृति को मैं अपना सर्वश्रेष्ठ दूं। प्राचीन संस्कृति पर इतराना नहीं, अपितु उसे उत्कर्ष प्राप्त कराना मेरा लक्ष्य है।
🙏🙏🚩🚩🙏🙏
Well said.
In my opinion the world is less peaceful today than any time in the past.It is undoubtedly correct that voilence is not the only weapon to fight against wrong deeds.But in today's world if we will think practically,there is a need of voilence to protect ourselves and prove our innocence.But yes ,Voilence need not to be physical.
There is a saying in hindi that:
झूठ बोलने से यदि किसी का भला हो तो वो झूठ सच के बराबर होता है।
ठीक वैसे ही मुझे लगता है कि,
खुद की आत्मरक्षा एवं निर्दोषता साबित करने के लिए की गयी हिंसा अहिंसा के बराबर है।
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