Thursday, 9 May 2019

शीर्षक- "गांधी जी के सत्य अहिंसा का सिद्धान्त वर्तमान संदर्भ में कितना प्रासंगिक है?" (विपक्ष में वक्तव्य)


परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
 धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥”
यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है। जिसका मतलब है कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होगी, तब-तब मैं इस भू-धरा पर जन्म लूंगा और आततायियों का संहार करूंगा। श्रीकृष्ण के भी कहने का आशय यही है कि यदि समाज संकट में है, तो हिंसा करना जायज है। हालांकि हिंसा करना या असत्य बोलना नैतिकता की श्रेणी में नहीं आता है, लेकिन मात्र सत्य व अहिंसा से कलियुग के इस प्रथम चरण में जीना असम्भव सा प्रतीत होता है।

कश्मीर में अलगाववादियों से लड रहे भारत के जवान हों या सरहद पर शहीद वीर सपूत-सभी अहिंसा चाहते हैं, लेकिन जब उरी में सैन्य छावनी में आतंकी हमला होता है, तो वह अहिंसा का रास्ता छोड आतंकी को मारकर हिंसा करता है, जिसका लक्ष्य शांति स्थापित करना होता है। अतः आज हिंसा भी अनिवार्य सी प्रतीत होती है।

मान्यवर! यदि अहिंसा और सत्य से दुनिया चलती, तो भगवान राम को रावण का वध नहीं करना पडता, और न ही महाभारत होती। पांडवों ने सत्य को चुना, परिणाम सबके सामने है- द्रौपदी का चीरहरण भरी सभा में हुआ था। उस समय तो भगवान ने इज्जत बचा ली थी, लेकिन जब आज एक युवती या बच्ची खेत में जाती है और उसके साथ दुष्कर्म करने की कोशिश की जाती है, तो उसे बचाने कोई कृष्ण नहीं आने वाला। यदि पास ही कोई हथियार अथवा कोई अन्य चीज उसे मिले, तो आत्मसम्मान में उसे हिंसा करने में तनिक भी देर नहीं करनी चाहिए। इसलिए गांधीजी की अहिंसा मात्र किसी कार्य की नहीं।

मान्यवर! आप किस सत्य की बात कर रहे हैं? इस असत्य की जीत के कारण बेगुनाह जेल में पिसता है और गुनहगार खुलेआम मजे लेता है, लेकिन अदालत को क्या चाहिए? तो जबाब आता है- सबूत। आप कितने ही उदाहरण आज देख सकते हैं।
फिर भी मैं आपको सटीक उदाहरण देता हूं-
जनाब! हमारे भारत की राजधानी दिल्ली के मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल जी ने अपने मुख्य सचिव के साथ मारपीट की, जो स्पष्ट हो भी चुकी है। लेकिन बेचारा सचिव आज भी परेशान है और केजरीवाल जी आनन्द ले रहे हैं।

आपको पता होना चाहिए कि सत्य बोलने वाला आदमी कष्टमय जीवन ही जीता है। असत्य को जितनी शीघ्रता से बोलकर अपना कार्य किया जा सकता है, सत्य से नहीं हो सकता। क्योंकि समाज को असत्य की आदत हो चुकी है। भ्रष्टाचार के द्वारा कैसे अमीर बना जा सकता है और कैसे ही रिश्वत ले-देकर अपना उल्लू सीधा किया जाता है, ये सब आप लोग जानते ही हैं। आप ही बताइए! कि आप में से क्या कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसने असत्य बोलकर अपना उल्लू सीधा न किया हो? उत्तर न में ही मिलेगा। तो बस यहीं निष्कर्ष निकल जाता है कि आज के जमाने में सत्य से काम नहीं चलता है।

अंत में, मैं भारतीय सनातन संस्कृति के उद्घोष के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूं-
धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो, मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥


अर्थात् जो पुरुष धर्म का नाश करता है, धर्म उसी का नाश कर देता है। इसीलिए धर्म का रक्षण करना चाहिए, क्योंकि तभी धर्म तुम्हारा रक्षण करेगा। यहाँ धर्म से आशय मानवता से है और यदि मानवता पर कोई संकट आता है, तो हिंसा व असत्य स्वीकार करनी चाहिए व धर्म का रक्षण कर एक सुखी धार्मिक समाज की स्थापना करनी चाहिए।
वह समय अलग था, जब गांधी जी के सत्य-अहिंसा से काम चला था। वैसे भी सिद्धान्त देना अलग चीज है और प्रैक्टिकल ज्ञान अलग चीज है। आज गांधी जी प्रासंगिक अवश्य हैं, लेकिन मात्र गांधी जी से काम नहीं चलने वाला यह वर्तमान का कटु सत्य है। आज यदि मैं इस भाषण में सत्य बोला, तो आप लोग ही मुझे बेबकूफ कहेंगे, इसलिए मैं भी आज असत्य ही बोल रहा हूं।
“ वन्दे मातरम्!! भारत माता की जय!! ”

(इस ब्लॉग को एक भाषण की तरह लिखने की कोशिश की गई है, जिसमें यह पक्ष रखा गया है कि क्या आज के समय में हिंसा आवश्यक सी प्रतीत होती है?क्या अहिंसा से कार्य सम्पन्न हो सकता है?क्या आवश्यकता होने पर अहिंसा का त्याग करना चाहिए?)"

By- Yogendra Shaurya Bhardwaj



A Manuscript observation by Yogendra Shaurya Bhardwaj

Researcher- Yogendra Shaurya Bhardwaj
PH.D.
Sanskrit and Indic Studies,
Jawaharlal Nehru University,
New Delhi-110067.

हस्तलिखित ग्रन्थ (पाण्डुलिपि) का सामान्य परिचयात्मक विवरण (रिपोर्ट)

1. पाण्डुलिपि क्रमांक- …१४६६….

पाण्डुलिपि का प्रकार…हस्तनिर्मित…
                   गुटका/ पोथी- गुटका (जीर्ण,पूर्ण,पत्रात्मक)
पाण्डुलिपि (ग्रन्थ का नाम)- …..अर्जुन-गीता….  ।

1. ग्रन्थ किस विद्यास्थान से सम्बद्ध है (व्याकरण, साहित्य आदि)- ……यह ग्रन्थ उपनिषद् विद्या से सम्बन्धित है।
2. कर्त्ता/रचयिता- …. अज्ञात …. ।
3. रचना काल- ………अज्ञात…………….
4. रचना काल के निर्धारण का आधार- …… …………अज्ञात……….
5. सर्वेक्षण का स्थान…..राजस्थान शोध संस्थान एवं राजस्थानी शब्दकोश चौपासनी, जोधपुर, राजस्थान………………………………. ।
                         
6. पुस्तक की कुल पत्रसंख्या- ….१२ पेज= २४ पृष्ठ………………………………।
विशेष- पाण्डुलिपि का प्रथम पृष्ठ रिक्त है।
(क) कितने पृष्ठ या पन्ने कोरे छोड़े गये हैं?............ नहीं………. । किस-किस स्थान पर छोड़े गये हैं?.....नहीं ………।
(ख) क्या कुछ पृष्ठ/पन्ने अपाठ्य हैं? …….हाँ……। कहाँ-कहाँ ?...... मध्य में अनेक श्लोक अस्पष्ट थे।
(ग) क्या कहीं कटे-फटे हैं?...... .हाँ......।
कहाँ-कहाँ ?..प्रत्येक पृष्ठ चारों ओर से हलके-हलके फटे हैं…।

7. प्रत्येक पृष्ठ की लम्बाईxचौड़ाई (इंचों और सेन्टीमीटरों में)……..१६.२(चौ०)x11.4(ल०) C.M……………
8. प्रत्येक पृष्ठ पर पंक्ति संख्या……ग्रन्थ के प्रत्येक पृष्ठ में 7 पंक्ति हैं (अनुमानित) ………………..।
प्रत्येक पंक्ति में अक्षर संख्या…. २७ अक्षर (अनुमानित) ।
9. पाण्डुलिपि का लिप्यासन प्रकार
(क) ईट
(ख) शिला
(ग) चर्म
(घ) ताम्र या अन्य धातु……….
(ङ) ताड़-पत्र
(च) भूर्ज-पत्र
(छ) छाल, पेपीरस आदि
(ज) कपड़ा
(झ) कागज……..हाँ..……

प्रकार सहित……मशीन द्वारा निर्मित………………
(ञ) अन्य…………………………………………………………………………
10. लिपि-प्रकार (देवनागरी आदि)……..देवनागरी(भाषा- संस्कृत)………………………………
11. लिखावट क्या एक ही हाथ की या कई हाथों की…..एक ही हाथ की लिखावट है ।
लिखावट के सम्बन्ध में अन्य विशिष्ट बातें………अर्जुन-गीता- देवनागरी लिपि में संस्कृत भाषा में हस्तनिर्मित यह पाण्डुलिपि, जिसकी लिखावट सुन्दर है । अक्षरों की बनावट सुन्दर एवं स्पष्ट है। पाण्डुलिपि के शब्द पढ़ने में सुगम है। शब्दों में तारतम्यता है। शब्दों के मध्य में स्थान का अभाव है, अतः कुछ स्थलों पर पढ़ने में असुविधा होती है। ……………………………………………..

12. प्रत्येक पन्ने पर लिपि का माप  (औसत में)…१७X७ C.M. लिपि का माप हैं।…….अक्षरों का माप………०.६सेमी०…शब्दों के मध्य स्थान का अभाव है, क्योंकि शब्दों में तारतम्यता है।…..

13. लिपिकार/लिपिकारों के …………ज्ञात………
नाम………………… गौड-ब्रहाण पूनमचंद …………………
लिपिकार/लिपिकारों के निर्धारण का आधार…पुष्पिका में प्राप्त सूचना के आधार पर। यथा-इति कृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनगीता-सम्पूर्णम्, १सम्वत्१९२९ माघसूद ४ शनिसरवासरे-लिखित-गौडब्राह्मण-पूनमचंद-जोधपुरमध्ये। वाचेविवारे-जिष्णानुजे श्रीकृष्णनमस्कार-कुवोः॥ ...............................................
स्थान………जोधपुर………………………….
लिप्यंकन की तिथि………१९२९ ई.……

14. लिप्यंकन-समय-निर्धारण का आधार… “अर्जुनगीता” ग्रन्थ (पाण्डुलिपि) के अन्त में ‘पुष्पिका’ में उल्लिखित ….. …………………………………………………
………………………………………………………………………………….
15. रचनाकार के आश्रयदाता (पूर्ण विवरण)……………अनुपलब्ध …………………
………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………
……………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………..
16. रचनाकार के पूर्ण विवरण का आधार…………………अनुपलब्ध………………
………………………………………………………………………………………………
17. लिपिकार के आश्रयदाता (पूर्ण विवरण) ……………………अनुपलब्ध…………………………
………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………
18. लिपिकार के पूर्ण विवरण का आधार…………………… अनुपलब्ध …………………….
……………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………..
19. रचना का उद्देश्य……ग्रन्थ के अध्ययन से पता चलता है कि यह ग्रन्थ को लिखने का उद्देश्य सम्यक्जीवनयापन जीवन में सुखप्राप्ति एवं भौतिकवस्तुओं से मोहभङ्ग जैसे विषयों पर चर्चा की गई है।………………………………………………………………………………

20. प्रतिलिपि करने का उद्देश…..ग्रन्थ के अन्त में पुष्पिका से ज्ञात होता है कि इस पाण्डुलिपि का प्रणयन जीवनमुक्ति हेतु एवं भगवान की अत्यन्त भक्ति के कारण किया गया है। यथा- “इति कृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनगीता-सम्पूर्णम्, १सम्वत्१९२९ माघसूद ४ शनिसरवासरे-लिखित-गौडब्राह्मण-पूनमचंद-जोधपुरमध्ये। वाचेविवारे-जिष्णानुजे श्रीकृष्णनमस्कार-कुवोः”॥  …………………………………………………..

21. पुस्तक का रख-रखाव-  बुगचा, थैला, सामान्य वेष्टन, पुट्ठे, तख्तियाँ, डोरी, ग्रन्थि, अन्य……. पत्रों को समान रूप से इकट्ठा करके बाहर से दो गत्तों द्वारा ढककर पुनः खाकी पेपर के मध्य में सुरक्षित, ऊपर से कीटरोधक लाल कपङे से सुरक्षित करके पुनः सफेद डोरी के द्वारा सुरक्षित बँधी हुई है।…………………………

22. स्याही की स्थिति- कच्ची स्याही/पक्की स्याही/ चमकदार….पक्की स्याही……………………….
23. पाण्डुलिपि-मंगलाचरण………..श्री गणेशाय नमः । ……………….

24. मंगलाचरण-प्रकार- आशीर्वादात्मक/नमस्क्रियात्मक/वस्तुनिर्देशात्मक……नमस्क्रियात्मक………..

25. मंगलाचरण की विषयवस्तु…ग्रन्थकार ग्रन्थारम्भ में विघ्नविघातक श्री गणेश को प्रणाम करने के पश्चात् अर्जुन का श्रीकृष्ण के प्रति किंकर्तव्यता का प्रश्न किया गया है।……

26. विषय का संक्षिप्त परिचय-अध्यायों की संख्या के उल्लेख के साथ……………श्रीपूनमचंद द्वारा लिखित इस अर्जुनगीता नामक ग्रन्थ अतिलघ्वात्मक (चतुर्विंशतिपृष्ठात्मक) ग्रन्थ है । यह ज्ञानयोग एवं कर्मयोग से सम्बन्धित है।  इस ग्रन्थ में ग्रन्थकार के द्वारा अपने इष्ट श्रीकृष्ण स्तुति भी वर्णित की गई है।………………….
(i) विषय का कुछ विस्तृत परिचय……… ग्रन्थारम्भ में ग्रन्थकार ने नमस्कारात्मक मंगलाचरण के द्वारा विघ्नविघातक गणेश को नमस्कार किया है। तत्पश्चात् अर्जुन द्वारा “किंकर्म किमकर्मेति की स्थिति में अर्जुन से उसका निवारण पूछा गया है। यथा- “दयाधर्मविहीनस्य कलौ पूर्णा निवर्तते। जतित्रमतेदिग्दिशायां किमकुर्वति केशव”॥ यह ग्रन्थ अनुष्टुप् श्लोक शैली में लिखा गया है। तथा पुष्पिका से ज्ञात होता है कि यह ग्रन्थ पूर्णरूप से प्राप्त है}। सम्पूर्ण ग्रन्थ में १०५ श्लोक हैं। पुष्पिका द्वारा ही लिपिकार का नाम एवं ग्रन्थ की रचना सम्बन्धित जानकारी प्राप्त होती है।……………………………………………..।
27. आदि (उद्धरण)… “श्री गणेशाय नमः। “दयाधर्मविहीनस्य कलौ पूर्णा निवर्तते। जतित्रमतेदिग्दिशायां किमकुर्वति केशव”॥……………………………….
28. मध्य (उद्धरण)……… ”किं पात्रस्य सुपात्रस्य पूजाकस्य अभ्यागतम्। किं धर्मसर्वधर्माणां दानं केन विशेषितम्॥ श्रीभगवान उवाच-
                             “शीलवतो विध्यनका विश्वेदपरायणम्। सध्यागायत्री संयुक्तं वित्रयाज स्प३मते”॥

29. अन्त (उद्धरण)… “सदासुखस्वरूपाय निरंजनपदप्रते। सदाप्राप्तं देवलोके सदाजीवो सदासुखी॥१०५॥................”॥
                       “इति कृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनगीता-सम्पूर्णम्, १सम्वत्१९२९ माघसूद ४ शनिसरवासरे-लिखित-गौडब्राह्मण-पूनमचंद-जोधपुरमध्ये। वाचेविवारे-जिष्णानुजे श्रीकृष्णनमस्कार-कुवोः”॥  …………..

30. चित्र कितने हैं?……नहीं ……सचित्र पृष्ठ कितने हैं?……अतिलघु इस ग्रन्थ में चित्र का अभाव है….
31. चित्र-कला किस काल की हैं?............. अतिलघु इस ग्रन्थ में चित्र का अभाव है…................
32. ग्रन्थ में आयी सभी पुष्पिकाएँ  –
(१) “श्री गणेशाय नमः। “दयाधर्मविहीनस्य कलौ पूर्णा निवर्तते। जतित्रमतेदिग्दिशायां किमकुर्वति केशव”॥
(२) “इति कृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनगीता-सम्पूर्णम्, १सम्वत्१९२९ माघसूद ४ शनिसरवासरे-लिखित-गौडब्राह्मण-पूनमचंद-जोधपुरमध्ये। वाचेविवारे-जिष्णानुजे श्रीकृष्णनमस्कार-कुवोः”॥
        सम्पादन एवं सम्पादन का प्रकार……………………अज्ञात………………………

33. पाण्डुलिपि के सन्दर्भ में अन्य विचारणीय तथ्य, जो आपको उचित प्रतीत होते हैं……………………
पाण्डुलिपि – “In Archaeology a manuscript is any early writing on stone, metal, wood, clay, linen, bark, and leaves of trees and prepared skins of animals, such as good, sheep and calves”.
पाण्डुलिपियाँ खजाने से कम नहीं-
पाण्डुलिपियाँ की दुनियाँ बड़ी रोचक और निराली है। ये ज्ञान-विज्ञान के खजाने हैं। इतिहास और समाज के आईने हैं। तरह-तरह की जानकारी देती ये किताबें हमारे जीवन को समृद्ध बनाती है। हमें इस लायक बनाती हैं कि हम अपने पैरों पर खड़े हो पाएँ। यहाँ कुछ ऐसी पाण्डुलिपियों के बारे में बताया जा रहा है, जिनका एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक महत्त्व है। इतना ही नहीं इसका क्रयण सामान्य उद्योगपतियों के बस का भी नहीं है। किताबें ज्ञान ही नहीं, अपितु पैसों के लिहाज से भी खजाने ही हैं। एक भी किताब आपके पास हो तो आप करोड़पति बन जायेंगे। जैसे-
१. फर्स्ट फोलियो (The First Folio)- अंग्रेजी साहित्य की सबसे बड़े कवि विलियम शेक्सपीयर की कृति १६२३ में प्रकाशित हुई थी। इसकी मूल कॉपी को क्रिस्टी ने २००१ में नीलामी के जरिए ६१ लाख में डॉलर में बेचा। इस किताब के खरीददार थे मॉइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक पॉल एलेन । किताब को विलियम शेक्सपीयर्स कॉमेडीज, हिस्टोरीज एंड ट्रेजडीज के नाम से भी जाना जाता है।

२. द कौडेक्स लिसेस्टर-   वर्त्तमान समय में यह दुनियाँ की सबसे महंगी पुस्तक है। इसे बिल गेट्स ने ३०.८० मिलियन डॉलर में खरीदा। यह राशि रूपये में करीब एक अरब ७० करोड़ रूपये होती है। किताब के लेखक प्रख्यात चित्रकार- लियानार्दो द विंची हैं। यह किताब एक सांइटिफिक जर्नल है। ७२ पेज की इस किताब को लियानादों के हाथों द्वारा १६०० शताब्दी में लिखा गया। इटैलियन भाषा में लिखी गई इस किताब में जीवाश्म से लेकर पानी के मूवमेंट तक की व्याख्या की गई है। यह भी बताया गया है कि चांद के चमकने का कारण उसकी सतह पर मौजूद पानी है। इस पानी से सूर्य की किरणें परावर्तित होकर चमक पैदा करती है। इस किताब के सबसे पहले खरीददार थॉमस कुक थे। उन्होंने इसे १७१७ में खरीदा। १९९४ में इसके मालिक थे – अमीड हैमर। उनसे बिल गेट्स ने इसे खरीदा।
   

३. मैग्नाकार्टा- यह दुनियां के महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेजों में से एक है। इस दस्तावेज को जारी कर इग्लैण्ड कें राजा जॉन ने सामंतों को कुछ अधिकार सौपें थे। मैग्नाकार्टा चार्टर पर इस सिद्दान्त पर जोर दिया गया कि राजा को भी कानूनों का पालन करना चाहिए। इतिहासकार मानते हैं कि मैग्नाकार्टा सामन्तों के लिए ही नहीं आम लोगों के लिए भी वैधानिकता का प्रतीक बना। इसमें ६३ धाराएं है। हालांकि लिखित तौर में यह दस्तावेज १२९७ में प्रकाश में आया। इसकी प्रति पर महाराज एडवर्ड प्रथम की मोहर लगी थी। दिसम्बर २००७ में मैग्नाकार्टा की एकमात्र प्रति की नीलामी सूदबी ने २ करोड़ १३ लाख डॉलर में की हैं।

४. द बे साम बुक-  दुनियां की चौथी सबसे महंगी किताब को अमेरीकी व्यापारी डेविड रुबस्टियन ने एक करोड़ ४२ लाख डॉलर में खरीदा। यह अमेरीका की पहली छपी किताब है। ६X5 इंच वाली यह धार्मिक पुस्तक १६४६ में प्रकाशित हुई थी। यह किताब पहले वेस्टर्न एन्ड साऊथ चर्च के संग्रह का एक हिस्सा था। प्रुफ की गलतियों को लेकर इस किताब की पहले काफी आलोचना हुई थी। मूल रचना हिब्रू में थी जिसका अंग्रेजी में अनुवाद किया गया।
५. द कैटरबरी टेल्स-  दुनियां की नौवी सबसे महंगी इस किताब की नीलामी १९९८ में ७५ लाख डॉलर में हुई । इसकी नीलामी क्रिस्टी ने की। जे एफ थाउसर ने इस किताब को १४७८ में लिखा था। जे एफ तब अग्रेंजी कविता  के जाने-माने हस्ती थे। किताब की सबसे महंगी प्रति इसके पहले संस्करण की है।
६. गॉस्पेल ऑफ हेनरी द लायन-  यह दिसम्बर १९८३ ई. मे एक करोड़ ११ लाख डॉलर में नीलाम हुई। रूपये में इसकी कीमत ६४ करोड़ के आसपास है। इस किताब को सूदबी की नीलामी में जर्मन सरकार ने खरीदा। किताब की एकमात्र प्रति आज उपलब्ध है। इसमें सेंट बेनेडिक्ट के आदेश हैं। मूल रूप से ईसाई धर्म की यह किताब हेनरी द लॉयन ड्युक् ऑफ सक्सेनी द्वारा अधिकृत है। किताब में कुल २६६ पेज हैं। १२ वीं सदी में लिखा गयी यह पाण्डुलिपि रोमन संस्कृति पर प्रकाश डालती है।

७. सेंट कैथबर्ट गॉस्पेल-  यह ईसाई धर्म की सबसे छोटे मेनूस्क्रिप्ट (पाण्डुलिपि) में से एक है। इसे स्टोनीहर्ट गॉस्पेल और सेंट कैथबर्ट गॉस्पेल ऑफ सेट जॉन नाम से भी जाना जाता है। सातवीं शताब्दी में इसे एक पॉकेट पुस्तक के रूप में लिखा गया था। बाद में इसकी खूबसूरत बाईंडिंग की गई। लैटिन में लिखी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व वाली यह किताब गॉस्पेल यूरोप की सर्वाधिक प्राचीन किताब मानी जाती है। २०१२ में इसे ब्रिटिश लाइब्रेरी ने एक करोड़ ४३ लाख डालर में खरीदा। रूपये में आज इसकी कीमत ८५ करोड़ है। लाइब्रेरी इस किताब का एक्जीविशन (प्रदर्शनी) लगाकार फंड जमा करती है। एक जुलाई से ३० सितम्बर २०१३ के बीच इसका प्रदर्शन डरबन विश्वविद्यालय में किया गया।
 
८. देश की सबसे महंगी किताब-  देश की सबसे महंगी किताब का रिकॉर्ड ओपस के नाम है। ऑटो मोबाइल कम्पनी ने फरारी ने इसमें अपने सफर को खूबसूरती से बंया किया है। किताब की कीमत हैं- डेढ़ करोड़ रूपये। इसका वजन ३७ किलो है और इसमें ८५२ पेज हैं। किताब के कवर पर एक फरारी के ट्रेडमार्क का घोड़े का चित्र है, जिसमें ३२ कैरेट के १५०० हीरे जड़े हैं।
९. बर्ड्स ऑफ अमेरिका- जेम्स ऑडवॉन की लिखी इस बर्ड्स ऑफ अमेरिकी पुस्तक की नीलामी २०१० ई. में एक करोड़ १५ लाख डॉलर में हुई। अमेरीकी पक्षियों पर लिखी गई यह एक लाजबाब और क्लासिक किताब है। इसमें जेम्स ऑडवॉन की ऑरिजनल ड्राइंग है। जेम्स प्रकृति विज्ञानी और चित्रकार दोनों थे। इसकी मात्र ११९ कॉपियां उपलब्ध है। गौर करने की बात यह है कि यह पुस्तक दुनियां की सबसे महंगी किताबों मे छठें, सातवें, आठवें, तीनों पायदानों पर हैं।

१०. लिइस डुहमेल डु मोनकाउ-  इसे पियरे एंथोनी ने १७६८ ई. में लिखा था। २००६ ई. में इसकी नीलामी ४५ लाख डॉलार में हुई। यह किताब पाँच वॉल्यूम में है। इसमें इलेस्ट्रेशन में विभिन्न प्रकार के फलों के चित्र है। फलवाले पौधों पर लिखी गई यह किताब अपने श्रेणी के किताबों में सबसे महंगी मानी जाती है।
११. द टेल्स ऑफ बीडल द बार्ड- जैके राउलिंग की यह किताब २००७ में ३९ लाख ८० हजार डॉलर में नीलाम हुई। जीवित लेखकों की श्रेणी की यह सबसे महंगी किताब थी। इसकी नीलामी दिसम्बर २००७ में हुई , जबकि यह पुस्तक कुछ ही दिनों पहले लिखा गया था। इसकी सात प्रतियों को जैके राउलिंग ने इलस्ट्रेशन हाथ से तैयार किये थे। छह प्रतियाँ मित्रों तथा सम्पादकों को देकर एक प्रति को उन्होंने अपने पास रखी। किसी भी किताब की पाण्डुलिपि से मिली यह अब तक की सबसे ज्यादा रकम थी।

१२. गुटेनबर्ग बाईबिल- दुनियां में मूदेबल प्रिंटिंग मशीन का आविष्कार गुटेनबर्ग ने किया था। उन्होंने इस मशीन से बाइबिल की ४८ प्रतियाँ प्रकाशित की थी। वे सारी प्रतियाँ आज ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व की है। इनमें से एक प्रति की नीलामी १९८७ में क्रिस्टी ने ४९ लाख डॉलर में की थी । रूपये में इसकी कीमत  २७ लाख के करीब है।

१३. सबसे छोटी किताब जापान में- इसका आकार केवल दशमलव ७५ गुणा दशमलव ७५ मिलीमीटर है। इसे प्रकाशित किया है जापानी प्रकाशक कम्पनी तोप्पान ने। चार ऋतुओं के फूल नाम से छपी इस किताब में जापान के सारे पौधों का विवरण है। इससे पहले सबसे छोटी किताब का रिकॉर्ड रूस के नाम था।

१४. सबसे बड़ी और भारी किताब-  ……यह रिकॉर्ड दिस इज मोहम्मद के नाम है। अरबी में लिखे इस किताब का वजन है १५०० किलोग्राम । पन्नों की कुलसंख्या ४२० हैं। पन्ने पाँच मीटर लम्बे और चार मीटर चौड़े हैं। इसे  सऊदी लेखक डॉ. अब्दुल्ला अब्दुल अजीज अल मुस्लिम ने लिखा है। किताब का उद्देश्य इस्लाम के संदेश को दुनियाभर में फैलाना हैं। चमड़े और कागज पर बनी इस किताब को बनाने में १०० लोगों को १६ महीने लगे।

 कुछ अन्य पाण्डुलिपियाँ-
इस प्रकार कहा जा सकता है कि पाण्डुलिपियाँ अमूल्य खजाना है। कहते हैं कि वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है, जिसका गौरवपूर्ण इतिहास नष्ट कर दिया जाता है। वह गौरवपूर्ण इतिहास हमें हमारे प्राचीन ग्रन्थों से पता चलता है। जिनको समय-समय पर हमारे पूर्वजों ने लिपिबद्ध किया है। कहा भी गया है- “भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतं संस्कृतिस्तथा॥” भारतीय प्राचीन ज्ञान पाण्डुलिपियों के द्वारा हमारे तक पहुँचा है। पाण्डुलिपियों के द्वारा हमें अपने अतीत के ज्ञान, वैभव, कला, संस्कृति आदि का ज्ञान होता है। अतः पाण्डुलिपियों का संरक्षण और पाण्डुलिपि विज्ञान का संवर्धन करना चाहिए।

हिन्दी माथे की बिंदी।

आज हिन्दी दिवस है, इसलिए मैंने सोचा कि आज कुछ लिखा जाए, जो हिंदी और हिंदी भाषी जनों को गौरवान्वित करे। इसलिए मैं कुछ लिख रहा हूँ, अच्छा लगे...